नागौर: राजस्थान के नागौर जिले के डांगावास गांव में साल 2015 में हुए दलित परिवार के पांच लोगों की हत्या का मामला एक बार फिर चर्चा में है। करीब 11 साल पुराने इस मामले में मेड़ता की एससी-एसटी स्पेशल कोर्ट ने 5 अगस्त को फैसला सुनाते हुए सीबीआई द्वारा आरोपी बनाए गए सभी 40 लोगों को बरी कर दिया।
कोर्ट के फैसले के बाद पीड़ित परिवार ने निराशा जताई है। परिवार के सदस्य किशनाराम ने कहा कि 11 साल में उनके परिवार की दो बार हत्या हुई है। उन्होंने कहा कि पहली बार गांव वालों ने उनके परिवार की हत्या की और अब अदालत के फैसले ने उन्हें दोबारा मार दिया है। परिवार अब न्याय के लिए हाई कोर्ट जाने की बात कह रहा है।
दूसरी ओर, आरोपियों की ओर से पैरवी कर रहे वकील ने कहा कि अदालत ने मामले के सभी पहलुओं का अध्ययन करने के बाद ही आरोपियों को दोषमुक्त किया है। अदालत के फैसले के बाद दलित समुदाय में निराशा है और न्याय की मांग को लेकर 12 अगस्त को जयपुर में कई संगठनों ने प्रदर्शन भी किया।
14 मई 2015 को क्या हुआ था?
नागौर जिले के मेड़ता सिटी का डांगावास गांव जाट बहुल इलाका है। गांव के एक हिस्से में अनुसूचित जाति के करीब 125 परिवार रहते हैं, जिसे मेघवाल मोहल्ला कहा जाता है।
14 मई 2015 की सुबह करीब 9 से 10 बजे के बीच खेत में काम कर रहे दलित परिवार पर हमला हुआ था। घटना के चश्मदीद और पीड़ित परिवार के सदस्य किशनाराम के मुताबिक, अचानक गांव की तरफ से ट्रैक्टर और दूसरे वाहनों में सवार होकर लोग लाठी-डंडे लेकर पहुंचे और परिवार पर हमला कर दिया।
किशनाराम के अनुसार, उनके पिता और भाइयों को ट्रैक्टर से कुचल दिया गया। परिवार की महिलाओं के साथ भी मारपीट की गई और उनके कपड़े तक फाड़ दिए गए। उन्होंने बताया कि इस हमले में परिवार के पांच लोगों की मौत हुई, जबकि 11 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
रतनाराम और गोगाराम की मौत घटनास्थल पर ही हो गई थी, जबकि पांचाराम, गणपतराम और गणेश ने अजमेर के जेएलएन अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।
परिवार के मुताबिक, घायल 11 सदस्यों को ठीक होने में करीब तीन साल तक का समय लगा।
परिवार की बुजुर्ग सदस्य सोनकी देवी ने घटना को याद करते हुए बताया कि हमलावर तेजाजी महाराज की जय बोलते हुए आए थे और लाठी-कुल्हाड़ियों से परिवार के लोगों को पीटना शुरू कर दिया था। उन्होंने बताया कि हमले में उनका हाथ टूट गया था और आज भी वह ठीक से काम नहीं करता। उनके इलाज में करीब दो साल लगे। इस घटना में उनके पति की भी मौत हुई थी।
परिवार के सदस्य गोविंद मेघवाल ने कहा कि उनके परिवार को बेरहमी से पीटा गया और ट्रैक्टरों से कुचलकर लोगों की हत्या कर दी गई, लेकिन अब तक उन्हें न्याय नहीं मिला है।
जमीन विवाद से शुरू हुआ था विवाद
इस मामले में गांव के दूसरे लोग सार्वजनिक तौर पर बात करने से बचते रहे हैं। कोर्ट से बरी किए गए सभी 40 लोग गांव के जाट समुदाय से हैं।
गांव के एक बुजुर्ग ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि साल 1960 में मेघवाल परिवार ने अपनी जमीन जाट समुदाय को 1500 रुपये में खेती के लिए गिरवी रखी थी। उनके मुताबिक, जमीन को लेकर दोनों पक्षों के बीच कई बार विवाद हुआ था।
घटना से कुछ दिन पहले इस विवाद को सुलझाने के लिए गांव में पंचायत भी बुलाई गई थी, लेकिन पीड़ित परिवार उसमें शामिल नहीं हुआ था।
एक ग्रामीण के मुताबिक, 10 मई को जाट समुदाय के लोगों ने तत्कालीन कलेक्टर को जमीन विवाद को लेकर ज्ञापन भी दिया था। इसके चार दिन बाद 14 मई को बड़ी संख्या में लोगों ने दलित परिवार पर हमला किया।
आरोपियों के वकील ने क्यों बताया बरी होने का कारण?
आरोपियों की ओर से पैरवी करने वाले एडवोकेट महिपाल चौधरी ने बताया कि डांगावास में दो परिवारों के बीच जमीन विवाद था, जिसमें पांच लोगों की मौत हुई और 11 लोग घायल हुए।
उन्होंने कहा कि अदालत ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया है। उनके मुताबिक, न्यायाधीश ने मामले के प्रत्येक पहलू का अध्ययन करते हुए 245 पन्नों का फैसला दिया।
वकील के अनुसार, अभियोजन पक्ष ने 41 गवाहों के बयान कराए, 163 दस्तावेज और 75 आर्टिकल पेश किए। उनका दावा है कि गवाहों के बयानों में काफी विरोधाभास था। गवाहों के पुलिस और सीबीआई के बयानों में भी अंतर पाया गया।
उनके मुताबिक, घटनास्थल की स्थिति, मेडिकल रिपोर्ट, दस्तावेज और अन्य साक्ष्य एक-दूसरे से मेल नहीं खाते थे। उन्होंने यह भी कहा कि जांच में कुछ ऐसे लोगों को आरोपी बनाया गया जो घटना के दिन गांव में मौजूद ही नहीं थे।
इसी घटना में गांव के एक अन्य व्यक्ति रामपाल पुरी की भी मौत हुई थी। आरोप था कि दलित परिवार ने गोली चलाकर उनकी हत्या की। एडवोकेट महिपाल चौधरी के अनुसार, इस मामले में सीबीआई जांच के बाद फाइनल रिपोर्ट दाखिल की गई थी।
पीड़ित पक्ष ने फैसले पर क्या कहा?
पीड़ित परिवार के वकील अब्दुल सलीम अंसारी ने कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि मामले में सभी आरोपी बरी हो जाएंगे।
उनके मुताबिक, घटना के चश्मदीदों और घायलों के बयान के आधार पर FIR दर्ज की गई थी और उसमें आरोपियों के नाम भी थे। उन्होंने कहा कि अदालत ने इन बयानों में विरोधाभास मानते हुए फैसला सुनाया है, लेकिन अब पीड़ित पक्ष इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील करेगा।
इस मामले पर ‘डांगावास दलित संहार’ किताब के लेखक भंवर मेघवंशी ने कहा कि घटना में जिस तरह हत्या की गई, वह स्पष्ट रूप से सामने है और इसमें जातिगत कारण भी था। उन्होंने अदालत के फैसले पर निराशा जताते हुए कहा कि इससे दलित समुदाय के न्याय व्यवस्था पर भरोसे को चोट पहुंची है।
कोर्ट ने 40 आरोपियों को किस आधार पर बरी किया?
मृतकों के परिवार की मांग पर तत्कालीन भाजपा सरकार ने मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी थी। सीबीआई ने जांच के बाद 40 लोगों को आरोपी बनाया था।
आरोपियों के वकील महिपाल चौधरी के मुताबिक, अदालत ने मामले में संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपियों को बरी किया। उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ हत्या का आरोप अदालत में साबित नहीं कर सका।
वकील ने यह भी कहा कि पुलिस, सीबीआई और अदालत में दिए गए गवाहों के बयानों तथा पेश किए गए दस्तावेजों में विरोधाभास था।
वहीं पीड़ित परिवार के सदस्य किशनाराम मेघवाल ने कहा कि परिवार ने हर स्तर पर अपने बयान दिए और जिन लोगों को उन्होंने घटना में शामिल देखा, उनके नाम और पहचान बताई।
सोनकी देवी ने कहा कि परिवार को न्याय चाहिए और जिन लोगों पर हत्या का आरोप था, उनके बरी होने से वह बेहद निराश हैं।
पीड़ित परिवार के वकील अब्दुल सलीम अंसारी ने कहा कि फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की जाएगी। उनका कहना है कि अचानक हुए हमले और बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के कारण सभी पीड़ितों के लिए हर आरोपी की पहचान करना संभव नहीं था।
जांच पर भी उठे सवाल
‘डांगावास दलित संहार’ के लेखक भंवर मेघवंशी ने पुलिस जांच पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि घटना की FIR कमजोर तरीके से दर्ज की गई और बाद में साक्ष्य जुटाने में भी कमियां रह गईं।
उनके मुताबिक, परिजनों की मांग पर मामला सीबीआई को सौंपा गया, लेकिन जांच एजेंसी बदलने के कारण भी मामले के महत्वपूर्ण पहलुओं में लापरवाही हुई।
उन्होंने कहा कि करीब 11 साल तक चले इस मामले में प्रशासन, अभियोजन और जांच एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठते हैं और यही न्याय नहीं मिलने का एक बड़ा कारण है।
सरकार के वादे भी पूरे नहीं हुए
घटना के बाद हुए आंदोलन के दौरान तत्कालीन सरकार ने मृतकों के परिवारों को 25-25 लाख रुपये, घायलों को 10-10 लाख रुपये और एक-एक सरकारी नौकरी देने का वादा किया था।
पीड़ित परिवार का कहना है कि 11 साल बीत जाने के बाद भी ये वादे पूरे नहीं हुए।
सोनकी देवी ने कहा कि इतने साल बीतने के बावजूद सरकार का कोई प्रतिनिधि उनके पास नहीं आया। उनके मुताबिक, परिवार को न तो मुआवजा मिला और न ही नौकरी।
भंवर मेघवंशी के मुताबिक, जन आंदोलन के बाद तत्कालीन भाजपा सरकार ने 18 मांगों पर समझौता किया था, लेकिन अभी तक वे मांगें पूरी नहीं हुई हैं। उन्होंने सरकार और राजनीतिक दलों की चुप्पी पर भी सवाल उठाया।
अब हाई कोर्ट जाएगा पीड़ित परिवार
फिलहाल 40 आरोपियों के बरी होने के बाद पीड़ित परिवार ने हाई कोर्ट जाने का फैसला किया है। परिवार का कहना है कि वह न्याय के लिए आगे भी कानूनी लड़ाई जारी रखेगा।
राजस्थान हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रवीण बलवदा के मुताबिक, पीड़ित परिवार इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार को इस मामले में वरिष्ठ फौजदारी वकील को पीड़ितों की ओर से पैरवी के लिए नियुक्त करना चाहिए।
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